सोलन में पंजाबी कविता संग्रह बसंती पौंण का विमोचन

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डीएनएन सोलन
भंडारी अदबी ट्रस्ट की ओर से सोलन में दो दिवसीय त्रिभाषीय कवि सम्मेलन का आयोजन किया गया। इसमें चार राज्यों के 50 कवियों ने हिन्दी, उर्दू और पंजाबी भाषा में कवितापाठ किया। इस मौके पर चंडीगढ़ के जाने माने लेखक अशोक नादिर के पंजाबी कविता संग्रह बसंती पौंण का विमोचन हरियाणा पंजाबी साहित्य अकादमी के निदेशक अश्विनी कुमार ने किया, जबकि वरिष्ठ पंजाबी साहित्कार सिरी राम अर्श इस मौके पर विशिष्ठ अतिथि थे। इस मौके पर बोलते हुए अश्विनी कुमार ने कहा कि किताब पेश करना एक कला है, जिसमें अशोक नादिर को हुनर हासिल है। उनका हिन्दी, उर्दू और पंजाब में बराबर का हस्तक्षेप है।
निम्मी वशिष्ठ ने फरमाया… गलां कीती सितारेयां दे नाल, दसां किसे नूं नहीं। गुरदीप गुल बोल थे… कितने ही ख्वाबों को आंखों में बसा कर रणना है, तुमसे मेहमाने खुसूसी को बुला कर रखणा है। पटियाला से आए अटवाल की कविता की बानगी कुछ इस तरह थी… मैं हास्यां दी, हर्षा दी चीख हैं, दोनों के अंदर भटकदयां में गमजदा संगीत है। सुशील हसरत नरेवली ने दोस्ती का बखान कुछ यूं किया… दोस्ती तो एक बहाना हो गया, देख अब दुश्मन भी सयाना हो गया। सुरजीत सिंह ने कहा कि… तेरी फुरकट से ही जज्बात ये राउनाई है, वरना ये जिंदगी इक उम्र की तन्हाई है। वर्षा इंद्रा की फरमाया यहां तां धने बादल भी छल गए होंगे, वो याद आए, हमें तो हम उन्हें याद आए होंगे। देव भारद्वाज ने सुंदर गजल पेश की। बोल थे… हम निगाहों से कलाम करते हैं, हुस्न का एहतराम करते हैं। अशोक नादिर की कविता के बोल थे गुलाब दे हुस्न दा इक ही जवाब है, बस गुलाब तो गुलाब है। यशपाल कपूर की कविता के बोल थे… वो चेहरा है कई सवालों की तरह, मैं पढ़ता हूं रोज उसे अखबारों की तरह। सिरीराम अर्श ने कहा जिस घड़ी तो कर लिया है प्यार दा इकरार मैं, उस घड़ी तो कर रहयां इंतजार मैं पेश कर वाहवाही लूटी। इस कार्यक्रम में शिमला के हरीश ठाकुर समेत पांच लेखकों ने अपनी रचनाएं पढ़ी।

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