समोसा के लिए CID लगाने वाले हजारों करोड़ के घोटाले पर खामोश क्यों : जयराम ठाकुर

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अधिकारियों को आपस में लड़ाकर अपना कौन सा काम निकलवा रहे हैं सुखविंदर सिंह सुक्खू

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मंडी : मंडी से जारी बयान में पूर्व मुख्यमंत्री एवं नेता प्रतिपक्ष जयराम ठाकुर ने कहा कि एक समोसे के हेर–फेर होने पर सीआईडी की जांच करवाने वाले मुख्यमंत्री, यात्री द्वारा बस में राहुल गांधी से जुड़ा वीडियो चलने पर बस कंडक्टर और ड्राइवर के खिलाफ कार्रवाई का पत्र जारी करने वाले मुख्यमंत्री सुखविंदर सिंह सुक्खू आज चेस्टर हिल में 1500 करोड़ से ज्यादा के घोटाले पर खामोश क्यों हैं। आखिर उनकी क्या विवशता है कि उन्हें इतने गंभीर आरोपों को टालने के लिए पत्रकारों के सामने हास्यप्रद जवाब देकर अपनी किरकिरी करवानी पड़ रही है। संपूर्ण प्रदेश के टॉप ब्यूरोक्रेट्स को आपस में लड़ाकर वह अपना कौन सा काम निकालना चाहते हैं? प्रदेश के लोग यह जानना चाहते हैं। व्यवस्था परिवर्तन का नारा देकर सत्ता संभालने वाले मुख्यमंत्री ने जब एक समोसा गायब होने पर सीआईडी के डीजी से लेकर डीएसपी रैंक के अधिकारियों को काम में लगा दिया, लेकिन चेस्टर हिल के सैकड़ों करोड़ के घोटाले में ‘टॉप ब्यूरोक्रेट्स’ के अधिकारियों के संवैधानिक और न्यायिक अधिकार क्षेत्र से बाहर दखल, आरोपी को लाभ देने की एकतरफा कार्रवाई और सक्षम अधिकारियों की जांच रिपोर्ट को अकारण खारिज कर देने वाले ‘टॉप ब्यूरोक्रेट्स’ के बारे में मुख्यमंत्री कोई जानकारी होने से कैसे इनकार कर रहे हैं?

जयराम ठाकुर ने कहा कि विभिन्न प्रतिष्ठित मीडिया समूह द्वारा प्रकाशित की गई रिपोर्ट्स के आधार पर यह साफ हुआ है कि इस मामले में कई स्तर पर गड़बड़ियां हुई हैं। मामले की शिकायत के बाद तहसीलदार द्वारा दो बार जांच कर रिपोर्ट दी गई और दोनों बार धारा 118 के उल्लंघन का आरोप लगाया गया। सब-डिविजनल ऑफिसर सोलन द्वारा मामले की जांच की गई और दोनों पक्षों की पूरी सुनवाई करने के बाद दस्तावेजों का संकलन और सत्यापन करने के बाद, उन्होंने जो सवाल खड़े किए और निष्कर्ष निकाला। उस आधार पर उपायुक्त द्वारा कार्रवाई की जानी चाहिए थी। मीडिया रिपोर्ट से यह साफ है कि जिस व्यक्ति के नाम जमीन है, उसका आयकर रिटर्न के 7 वर्षों का औसत 8 लाख से भी कम है और वह करोड़ों की बिल्डिंग्स बना रहा है। जमीन मालिक को लोन दिलाने और उसकी किश्त भरने का काम कोई वह कंपनी कर रही है, जो कि चेस्टर हिल के पहले के प्रोजेक्ट्स बना चुकी है, जो कि हिमाचल के विभिन्न कानून के तहत अवैध है। ऐसे में सवाल उठता है कि एसडीओ द्वारा कार्रवाई करने रिपोर्ट लगाई गई तो आरोपियों पर कार्रवाई करने, चल रहे अवैध निर्माण कार्यों पर रोक लगाने के बजाय जिला उपायुक्त ने फाइल को राज्य सचिवालय क्यों भेजा? जबकि उन्हें स्वयं कार्रवाई करनी चाहिए थी। यह मामला केवल एवं केवल उनके अधिकार क्षेत्र से जुड़ा हुआ था और वह स्वयं ही संबंधित मामले में निष्पादन न्यायिक अधिकारी होने के कारण वह कार्रवाई हेतु अधिकृत थे। यदि उनकी कार्रवाई से कोई पक्ष असंतुष्ट होता तो उसके पास न्यायालय जाने का अधिकार था। अतः इस मामले को जिला उपायुक्त द्वारा अनावश्यक रूप से उच्च अधिकारियों को प्रेषित करना समझ के परे है। उससे भी बड़ी बात राज्य सरकार का सचिवालय अपने संवैधानिक अधिकार क्षेत्र के बाहर जाकर क्यों काम करना चाहता है।

जयराम ठाकुर ने कहा कि प्रोजेक्ट में अनियमितताओं की लगातार शिकायतें मिल रही थीं। इस पर स्थानीय स्तर पर जांच हुई, लेकिन कार्रवाई नहीं की गई। मीडिया की रिपोर्ट्स से ही पता चला है कि डंपिंग साइट की ऊंचाई 125 से 150 फीट हो गई। इलीगल डंपिंग के कारण गांव के पानी के प्राकृतिक स्रोत बंद हो गए। बिल्डिंग की हाइट 25 मीटर से 35 मीटर हाइट बन गई, जिसे गिराने के आदेश थे, जिन पर समय रहते कार्रवाई नहीं हुई। हर कदम पर अनिवार्यताओं और उनको अनदेखा करने की वजह क्या है? वह भी प्रदेश के लोग जानना चाहते हैं।

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