सेब बागवानों को नौणी विवि ने दी यह सलाह

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डीएनएन शिमला
पिछले कुछ वर्षों से बागवानों को सेब के लिए कैन खाद (कैल्शियम अमोनियम नाईट्रेट) उपलब्ध नहीं हो रही है क्योंकि अधिकतर जगह इसका उत्पादन बंद हो चुका है। इस कारण बागवान परेशानी की स्थिति में हैं। डॉ वाईएस परमार औद्यानिकी एवं वानिकी विश्वविद्यालय,नौणी, ने इस स्थिति से निपटने के लिए और किसानों की यह चिंता दूर करने के लिए एक विशेषसलाह दी है।
विश्वविद्यालय के मृदा विज्ञान एवं जल प्रबन्धन विभाग के विभागाध्यक्षडा॰ जेसी शर्मा ने बताया कि कुछ बागवानों द्वारा उपयोग किए जा रहे कैल्शियम नाईट्रेट में नत्रजन की मात्रा केवल 15.5 प्रतिशत ही होती है, जो की कैन और यूरिया की तुलना में काफी कम है। सेब में नत्रजनकी पूर्ति के लिए लगभग 4.5किलोग्राम खाद प्रति पेड़ कि दर से डालनी पड़ सकती है, जो कि एक बहुत महंगा विकल्प है। उन्होनें बताया कि यह एक घुलनशील खाद है जिसका अधिकतर उपयोग पॉलीहाउस तथा फर्टिगेशन में ही किया जाता है। जो बागवान इसका प्रयोग करते हैं, वे ज़्यादातर इसे कम मात्रा यानि 500-1000 ग्राम प्रति पौधा ही डालते हैं जिससे इस महत्वपूर्ण अवयक की भरपाई नहीं हो पाती है।

विश्वविद्यालय के अनुसंधान निदेशक डा॰ जे एन शर्मा ने बताया कि नौणी विवि द्वारा किए गए अनुसंधानों में यह पाया गया है कि कैन खाद के सस्ते विकल्प के रूप में यूरिया को उपयोग में लाया जा सकता है, जिसके कोई दुस्षप्रभाव नहीं पाये गए हैं और यह उपयुक्त मात्रा व विधि में प्रयोग करने पर मृदा स्वास्थ्य पर भी कोई विपरीत असर नहीं डालता है।

कितनी मात्रा में डाले खाद 

एक दस वर्ष व इससे ऊपर की आयु के फलदार पेड़ में डेढ़ किलो (1.5 kg) यूरिया का उपयोग वैज्ञानिकों द्वारा सुझाया गया है। यह मात्रा, दो हिस्सों में बराबर डाली जानी चाहिए- पहले 750 ग्राम यूरिया, फूल आने के लगभग तीन हफ्ते पहले डाली जानी चाहिए और दूसरी, फूल आने के एक महीने बाद। इसके साथ ही अक्तूबर-नवम्बर में तौलियों में लगभग बारह सौ ग्राम(1200 gram) बारीक बुझा हुआ चूना (मिट्टी की आवश्यकता अनुसार), मिट्टी से अच्छी तरह मिला दें।

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