DNN सोलन ब्यूरो (आदित्य सोफत)
12 जनवरी। जिला के बाजार इन दिनों मूंगफली, गच्चक, तिल लड्डू व रेवड़ी की खुशबू से महक रहे है। बाजार में जहां कहीं भी नज़र घुमाई जाए, वहीं दुकानों के बाहर तरह-तरह की गच्चक व अन्य सामान लोहड़ी त्यौहार को लेकर सजा है। लेकिन, अन्य त्योहारों की तरह कोरोना काल के बीच आए इस त्यौहार पर भी दुकानदारों के माथे से चिंता की लकीरे दूर नहीं हुई है। कारण सिर्फ एक…..क्या यह त्यौहार मुनाफे में रहेगा या नहीं? यह प्रश्न भी उनके जहन में अभी भी ज़िंदा है।
उधर, हर बार की तरह त्यौहार से पहले बाज़ारों में भीड़ है, लेकिन सामान की खरीददारी करने वाले कम है। मंगलवार को भी जिला मुख्यालय सोलन के बाज़ारों में खूब चहल-पहल रही, लेकिन दुकानों में अधिक रश नहीं देखा गया। साथ ही बाज़ारों में सजने वाली लोहड़ी को लेकर भी आयोजनकर्ताओं की नज़रें जिला प्रशासन के आदेशों पर टिकी रही। जिला प्रशासन के आदेशों के बाद ही आयोजनकर्ता बाज़ारों में लोहड़ी सजाएंगे।
लुप्त हो गया लोहड़ी पर “सुंदर मुंदरीए” जैसे गीतों
युवा पीढ़ी तेजी से आधुनिकता की ओर बढ़ती जा रही है। इसी के चलते संस्कृति व पर्वों पर आधुनिकता भारी पड़ रही है। लोहड़ी पर्व पर जहां ‘सुंदर मुंदरीए जैसे गीतों का पहले प्रचलन होता था और लोहड़ी पर्व से हफ्ता पहले ही इसकी तैयारियां शुरू हो जाती थी, आज के आधुनिक दौर में यह सब एक सपना बनकर रह गई है। वर्तमान में न तो कोई यह गीत सुनता नजर आता है और न ही इसको लेकर अधिक उत्साह दिखाई देता है क्योंकि वर्तमान में केवल सोशल मीडिया पर एक दूसरे को बधाई संदेश दिए जाते है। आधुनिकता की इस दौड़ में लोग अपनी पुरानी संस्कृति की प्राचीन परम्पराओ व तीज-त्योहारों को भूलते नजर आ रहे है। आपसी भाईचारे का प्रतीक लोहड़ी के त्योहार की चमक फीकी पड़ती जा रही है। दुकानों में मूंगफली, रेवड़ी व अन्य चीजें तो बिक रही है लेकिन वह पुराना जोश नहीं दिखाई दे रहा है।
बता दें कि आज से कुछ वर्षों पहले लोहड़ी पर्व को लेकर एक विशेष क्रेज लोगों में होता था। वहीं लोहड़ी पर पर एक स्थान पर एकत्र होकर लोहड़ी जलाई जाती थी और इसके लिए एक-एक के घर से लकड़ी व गोबर के उपले भी जलाने के लिए इक्कठे किए जाते थे। गौरतलब हो कि आज की आधुनिकता की दौड़ इंटरनेट का बोलबाला बढ़ गया है और पर्व की अहमियत धीरे-धीरे कम होने लगी है। आज की युवा पीढ़ी आधुनिकता की ओर अधिक भाग रहे है, जबकि प्राचीन विलस्तो, धरोहरों व पर्वो की अहमियत को भूलती जा रही है। युवा पीढी आधुनिक दौर में चल रहे प्रचलनों की ओर अधिक आकर्षित हो रही है। उधर, कोरोना वायरस के बीच भी बड़े आयोजनों को लेकर रोक है।















