बागी क्षेत्र में चेरी में रोग नियंत्रण के लिए अनुशंसा

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DNN नौणी 

18 सितंबर हाल ही में शिमला जिले के बागी क्षेत्र से चेरी की शाखाओं/पेड़ों के सूखने की समस्या के संबंध में कुछ रिपोर्ट प्राप्त हुई। इन रिपोर्टों पर तुरंत कार्रवाई करते हुए  डॉ यशवंत सिंह परमार औदयानिकी एवं  वानिकी विश्वविद्यालय, नौणी ने वैज्ञानिकों की दो टीम को प्रभावित क्षेत्र में लक्षणों का निरीक्षण करने और रोगग्रस्त पौधों के नमूने एकत्रित करने के लिए भेजा। दोनों टीमों ने उत्पादकों के साथ बातचीत की, बगीचों की स्थिति का आकलन किया और रोगग्रस्त पौधों के नमूने एकत्रित किए। बागी पंचायत के विभिन्न बगीचों का दौरा किया और प्रभावित क्षेत्र का विस्तृत सर्वेक्षण किया।

विश्वविद्यालय के अनुसंधान निदेशक डॉ. संजीव चौहान ने बताया कि मौजूदा समस्या की गंभीरता को समझने के लिए टीमों ने प्रभावित उत्पादकों से मुलाकात की और पाया कि समस्या केवल बागी और आसपास के क्षेत्रों तक ही सीमित है। कंडयाली क्षेत्र के चेरी उत्पादकों से भी जानकारी जुटाई गई, जो इस समस्या से प्रभावित नहीं हैं। डॉ. चौहान ने बताया कि प्रभावित पौधों में पत्तियों का पीलापन, फटना, लाल और कांसे जैसा होने के लक्षण देखे गए जो धीरे-धीरे पूरे पौधे में फैलते हुए प्रभावित पौधे की मृत्यु का कारण बन रहे हैं। संक्रमित पौधों की जड़ें स्वस्थ पाई गईं जिससे यह पता चला कि किसी भी मिट्टी से पैदा होने वाले रोगज़नक़ के साथ इसका संबंध नहीं है।

संक्रमण के लक्षण फाइटोप्लाज्मा नामक एक जीवाणु के कारण होने वाले रोग से मेल खाते थे। इसलिए, इकट्ठा किए गए नमूनों का प्रयोगशाला में फ्लोरेसेंस माइक्रोस्कोपी परीक्षण किया गया जिससे फाइटोप्लाज्मा की उपस्थिति की पुष्टि हुई। इस रोगज़नक़ का प्रसार आमतौर पर लीफ हॉपर नामक कीट के माध्यम से होता है। प्रभावित पेड़ों के आसपास से एकत्र किए गए लीफ हॉपर के हिस्सों की भी फ्लोरोसेंस माइक्रोस्कोप के माध्यम से जांच की गई। इस परीक्षण से भी इन चेरी के पौधों में फाइटोप्लाज्मा रोग की उपस्थिति की पुष्टि हुई।

किसानों को इस बीमारी के प्रबंधन और नियंत्रण के बारे में अवगत करवाने के लिए विश्वविद्यालय सितंबर और अक्टूबर में प्रभावित क्षेत्रों में जागरूकता शिविर आयोजित करेगा।

विश्वविद्यालय ने चेरी में इस बीमारी को नियंत्रित करने के लिए निम्नलिखित तदर्थ प्रबंधन विधियों की सिफारिश की है:

  • प्रभावित पेड़ों के तने में छेद कर 2 ग्राम Oxytetracycline Hydrochloride (OTC-HCL) antibiotic तथा 10 mg Citric Acid को 10ml पानी में घोलकर इन छिद्रों में पिपेट द्वारा बूंद बूंद कर डालें। तद्पश्चात छिद्रों को चिकनी मिट्टी और गोबर की खाद, बराबर भाग में, का लेप बनाकर बंद कर दे।
  • लीफ़ होप्पर के प्रबंधन के लिए Imidacloprid 17.8% SL की 50ml मात्रा को 200 लीटर पानी या Oxy-demeton Methyl 25% EC की 200 ml मात्रा को 200 लीटर पानी में घोलकर स्प्रे करें।
  • अग्निअस्त्र (4-5L/200L) या दशपर्णी अर्क (4-5L/200L) की स्प्रे 7-8 दिन के अंतराल पर करें।
  • साप्ताहिक अंतराल पर पौधों में 2 लीटर प्रति वृक्ष की दर से जीवामृत की 2-3 बार सिंचाई करें।
  •  प्रभावित वृक्षों से नए पौधे तैयार करने के लिए कलम न लें क्योंकि संक्रमित पौधे फाइटोप्लाज्मा के प्रसार के स्रोत के रूप में कार्य करते हैं।
  • रोगमुक्त नर्सरी के लिए स्वस्थ रोपण सामग्री का ही प्रयोग करें।
  • छंटाई करते समय रोगग्रस्त टहनियों/शाखाओं को हटा दें और नष्ट कर दें।
  • प्रभावित क्षेत्र से कलमों सहित रोपण सामग्री की आवाजाही पर प्रतिबंध रखें।

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