दवा उद्योग को ठोका पौने 4 करोड़ का टैक्स

Crime Kasauli Solan

डीएनएन परवाणू
आबकारी एवं कराधान विभाग के दक्षिणी प्रवर्तन क्षेत्र परवाणू ने दवा निर्माण में लगे एक बड़े उद्योग को पौने चार करोड़ से भी अधिक का टैक्स लगाया है। बददी में यह दवा उद्योग पिछ्ले 5 वर्षों से सरकार को करोड़ों रुपये के टैक्स का चूना लगा रहा था। इस बात का खुलासा तब हुआ जब दक्षिणी प्रवर्तन क्षेत्र की एक इंस्पेक्टर इस दवा उद्योग के जैसे ही नाम के अन्य व्यपारी की रिटर्न खंगाली।
दवा उद्योग की रिटर्न देखने पर पता चला की उसकी बिक्री का बड़ा हिस्सा टैक्स फ्री दिखाया जा रहा है। हिमाचल प्रदेश में लगभग सभी प्रकार की दवाईयों पर 5% की दर से टैक्स लगता है अतः दवा उद्योग द्वारा कर मुक्त सामान बेचा जाना इस उद्योग को संदेह के घेरे में ले आया।
उप आबकारी एवं कराधानआयुक्त, डॉ. सुनील कुमार ने इसकी पुष्टि की है। यह जानकारी देते हुए कहा कि उद्योगपति ने विभागीय में द्लील दी की उसकी औद्योगिक इकाई में सेफ़ा समूह की दवाईयां भी बनाई जाती हैं जो पूर्णतय कर मुक्त है। जब उद्योगपति से उन दवाईयों को कर मुक्त घोषित करने की अधिसूचना प्रस्तुत करने को कहा, तो उद्योगपति ने कुछ समय बाद अपनी पुरानी दलील पलटते हुए बताया कि वे दवाईयां कर मुक्त नहीं है अपितु उन्हें 1% कर की दर से प्रदेश के बाहर बेचा गया है। विभागीय जाँच में पता चला कि उद्योगपति की यह दलील भी पूरी तरह गलत है क्योंकि न तो उसने 1% की दर से उक्त बिक्री पर पिछ्ले वर्षोँ मैं टैक्स जमा किया था व न ही सामान प्रदेश से बाहर ले जाते समय बैरियर पर इसकी कोई घोषणा की थी। अतः प्रवर्तन क्षेत्र द्वारा उद्योगपति से ‘C’ फॉर्म की मांग की गई ताकि यह साबित हो सके की उक्त दवाईयां सचमुच में ही अन्तर्राज्यीय व्यापार द्वारा प्रदेश के बाहर बेची गईं है या नहीं।
गौरतलब है कि इस उद्योग के उत्पादन का आधे से अधिक हिस्सा वास्तव ही में ‘C’ फॉर्म के द्वारा अन्तर्राज्यीय व्यापार के तहत प्रदेश के बाहर बेचा जाता था। विभाग द्वारा ऐसी टर्नओवर को नहीं छेड़ा गया और विभागीय कार्यवाही केवल कर मुक्त दर्शायी गई दवाईयों के टर्न ओवर तक ही सीमित रही। उद्योगपति ने अपने वास्तविक अन्तर्राज्यीय व्यापार में प्राप्त किये हुए असली ‘C’ फॉर्मो पर दर्शायी गई रकम के अंको में कुछ अंक जोड़कर उसे बढ़ा डाला व प्रवर्तन क्षेत्र में यह सिद्ध करने के लिए प्रस्तुत कर दिया की कर मुक्त दवाईयां भी ‘C’ फॉर्मो के ज़रिये ही बेची गई थीं।
उद्योगपति द्वारा ‘C’ फॉर्मो की मौलिक राशि से की गई छेडछाड़ या हेराफेरी आसानी से सिद्ध की जा सकती थी फिर भी दक्षिणी प्रवर्तन क्षेत्र द्वारा चुनिंदा ‘C’ फॉर्मो को प्रदेश की फोरेंसिक प्रयोगशाला, जुंगा भेजा गया। प्रयोगशाला द्वारा विस्तारपूर्वक विश्लेषण के पश्चात् रिपोर्ट दी गई जिससे यह सिद्ध हो गया की उद्योगपति ने ‘C’ फॉर्मो पर अंकित मौलिक राशि में भारी परिवर्तन किए थे। किसी ‘C’ फॉर्म में दस लाख, बीस लाख, तीस लाख, तो किसी में चालीस-पचास लाख तक जोड़ दिए गए थे ताकि प्रदेश के खज़ाने को टैक्स चोरी से चूना लगाया जा सकें। दो फॉर्मो पर तो सत्तर-सत्तर लाख रुपए तक की राशि तक बढ़ा डाली गई थी ( चित्र में देखें कि किस प्रकार 1,87,510 की राशि से पहले ‘7’ लगा कर 71,87,510 रुपए का बना डाला गया )।
उद्योगपति का सामना जब इन तथ्यों से करवाया गया तो उसने तुरन्त अपनी ग़लती स्वीकारते हुए सारा टैक्स अदा करने की हामी भर दी यदपि जुर्माना न लगाए जाने की गुहार भी लगाई। इस प्रकार यह पूरी तरह सिद्ध हो गया कि उद्योगपति ने गत पाँच वर्षों में लगभग 50 करोड़ की दवाईयों पर टैक्स की चोरी कर डाली थी। टैक्स व ब्याज की कुल 3 करोड़ 85 लाख की राशि में से उद्योगपति ने 35 लाख रुपये सरकारी खज़ाने में जमा भी करवा दिए हैं। शेष राशि जमा करने के लिए उसे एक महीने का समय दिया गया है। उद्योग के प्रति जुर्माने से सम्बंधित मामला अभी ही शुरु किया गया है और इस प्रकार की हेराफेरी करने के लिए उद्योगपति को 5 करोड़ तक का अलग से जुर्माना भी लगाया जा सकता है। इस मामले को खोज़ने में इस्पेक्टर रीमा सूद ने अहम भूमिका निभाई है व उसे इस उत्कृष्ट कार्य के लिए प्रशस्ति-पत्र प्रदान किया गया है।  आबकारी एवं कराधान अधिकारी, डा० अमित शोष्टा, इस्पेक्टर रूपिंदर सिंह, दीप चन्द शर्मा, कुलदीप शर्मा, शशिकांत व मनोज सचदेवा ने इस मामलें में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है।

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