जलवायु परिवर्तन कृषि के लिए गंभीर खतरा

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प्रख्यात गेहूं आनुवंशिकीविद् एवं प्लांट ब्रीडर डॉ. मनमोहन कोहली ने एक ज्ञानवर्धक व्याख्यान प्रस्तुत करते हुए गेहूं आनुवंशिकी, प्रजनन तथा जर्मप्लाज्म सुधार के क्षेत्र में अपने व्यापक अनुभव साझा किए। इस विशेषज्ञ व्याख्यान का आयोजन डॉ यशवंत सिंह परमार औद्यानिकी एवं वानिकी विश्वविद्यालय, नौणी (Nauni) के प्लेसमेंट एवं इंडस्ट्री कोऑर्डिनेशन सेल द्वारा किया गया।

डॉ. कोहली रोग-प्रतिरोधी गेहूं किस्मों के विकास में अपने अग्रणी योगदान के लिए अंतरराष्ट्रीय स्तर पर विख्यात हैं। उन्होंने अपनी प्रारंभिक शिक्षा सोलन से प्राप्त की तथा अपने वैश्विक शोध करियर की शुरुआत अंतरराष्ट्रीय मक्का एवं गेहूं सुधार केंद्र, मेक्सिको से की, जहाँ उन्होंने नोबेल पुरस्कार विजेता और हरित क्रांति की जनक डॉ. नॉर्मन बोरलॉग के साथ से कार्य किया। उनके कार्य ने गेहूं आनुवंशिकी एवं प्रजनन कार्यक्रमों को सुदृढ़ किया, विशेषकर रोग-प्रतिरोध एवं संकरण रणनीतियों पर विशेष बल दिया।

संकाय सदस्यों एवं विद्यार्थियों को संबोधित करते हुए डॉ. कोहली ने हरित क्रांति पर अपने विचार साझा किए और बताया कि उन्नत किस्मों ने भारत की कृषि व्यवस्था को किस प्रकार रूपांतरित किया। उन्होंने हरित क्रांति को सफल बनाने वाले अनसुने नायकों को याद किया। वर्तमान चुनौतियों पर प्रकाश डालते हुए उन्होंने कहा कि जलवायु परिवर्तन कृषि के लिए गंभीर खतरा है, किंतु सामूहिक वैज्ञानिक प्रयासों और तकनीकी नवाचार के माध्यम से टिकाऊ समाधान विकसित किए जा सकते हैं। उन्होंने संकाय और विद्यार्थियों से बहु-विषयक अध्ययन दृष्टिकोण अपनाने का आग्रह किया तथा कहा कि आधुनिक कृषि चुनौतियों के समाधान के लिए समन्वित वैज्ञानिक ज्ञान आवश्यक है। उन्होंने किसानों तक सही और समय पर जानकारी पहुँचाने के महत्व पर भी बल दिया। डॉ. कोहली ने सफल अनुसंधान एवं प्रसार कार्यों के लिए टीम वर्क को अत्यंत महत्वपूर्ण बताया।

इस अवसर पर भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद के पूर्व उप महानिदेशक (कृषि शिक्षा) डॉ. आर.सी. अग्रवाल ने कृषि शिक्षा में राष्ट्रीय शिक्षा नीति (NEP) 2020 के क्रियान्वयन की रणनीतियों पर विस्तृत प्रस्तुति दी। उन्होंने राष्ट्रीय कृषि उच्च शिक्षा परियोजना (NAHEP) पर भी प्रकाश डाला और बताया कि इस परियोजना ने देशभर में कृषि शिक्षा को सुदृढ़ करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। डॉ. अग्रवाल ने कृषि में “जीन क्रांति” पर भी विचार व्यक्त किए और आत्मनिर्भर कृषि कार्यक्रमों की आवश्यकता पर बल दिया। विश्वविद्यालय के पूर्व अनुसंधान निदेशक डॉ. के.के. जिंदल ने पर्वतीय बागवानी पर जलवायु परिवर्तन के प्रभाव विषय पर अपने विचार साझा किए।

विश्वविद्यालय के कुलपति प्रो. राजेश्वर सिंह चंदेल ने विचार-विमर्श की सराहना करते हुए कहा कि विश्वविद्यालय के वैज्ञानिकों और विद्यार्थियों को कृषक समुदाय के हित में नवाचारी एवं जलवायु-सहिष्णु तकनीकों के विकास हेतु निरंतर कार्य करते रहना चाहिए।

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