नहीं टूटी मेले की परंपरा, बहन से मिलने के बाद लौटी मां शूलिनी

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DNN सोलन (आदित्य सोफत)
रविवार को अधिष्ठात्री देवी मां शूलिनी तीन दिन के बाद अपने मूल स्थान लौट गई। वैश्विक महामारी कोरोना वायरस (कोविड-19) के खतरे के बीच मेले का यह सूक्ष्म रूप देखने को मिला है। ऐसा पहली बार हुआ है कि लोगों को माता के दर्शन ऑनलाइन करने पड़े है। कोविड-19 चलते इस बार मेले के दौरान भंडारे व अन्य कार्यक्रमों का आयोजन नहीं भी किया गया है। बता दें कि कोरोना वायरस के चलते  शुक्रवार को मां शूलिनी अपने स्थान से अपनी बहन को मिलने के लिए आई थी। मेले के पहले शहर में लोगों की भीड़ एकत्र न हो इसको लेकर शहर के कुछ हिस्सों में धारा 144 लगाई गई थी। मंदिर के आसपास सुरक्षा बल तैनात किया गया थे। रविवार को भी इसी तरह का माहौल सोलन में देखा गया और धारा 144 लागू की गई थी। रविवार को प्रशासन व कड़ी सुरक्षा के बीच माँ शूलिनी को मूल स्थान पर लाया गया। 
बघाट रियासत से जुड़ा है मेले का इतिहास
मेले का इतिहास बघाट रियासत से जुड़ा हुआ है। मां शूलिनी बघाट रियासत के शासकों की कुल देवी मानी जाती हैं। मां शूलिनी देवी के नाम से ही सोलन का नामकरण हुआ है। रियासत के विभिन्न शासकों के काल से ही माता शूलिनी का मेला आयोजित किया जा रहा है।
मेले की परंपरा आज भी कायम
लोगों का मानना है कि मां शूलिनी के प्रसन्न होने पर क्षेत्र में किसी भी प्रकार की प्राकृतिक आपदा व महामारी का प्रकोप नहीं होता है बल्कि खुशहाली आती है और मेले की यह परंपरा आज भी कायम है। हालांकि, कोरोना वायरस (कोविड-19) के चलते मेले का सूक्ष्म रूप देखने को मिला है। 

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