Dnewsnetwork
डॉ. यशवंत सिंह परमार औद्यानिकी एवं वानिकी विश्वविद्यालय, नौणी में ‘जलवायु परिवर्तन जनित आपदाएँ एवं आपदा जोखिम न्यूनीकरण रणनीतियाँ’ विषय पर आयोजित तीन दिवसीय प्रशिक्षण कार्यक्रम सम्पन्न हुआ। इस कार्यक्रम का आयोजन विश्वविद्यालय के पर्यावरण विज्ञान विभाग द्वारा किया गया। इसका उद्देश्य विभिन्न सरकारी संगठनों एवं संबंधित अधिकारियों को शिक्षित करना तथा जलवायु सहनशीलता और आपदा जोखिम प्रबंधन के क्षेत्र में उनकी जानकारी एवं क्षमता को बढ़ाना था।
यह प्रशिक्षण कार्यक्रम सात सत्रों में आयोजित किया गया, जिसमें देशभर के प्रतिष्ठित संस्थानों से आए विशेषज्ञों एवं विद्वानों द्वारा चौदह व्याख्यान दिए गए। कार्यक्रम में कुल 51 प्रतिभागियों ने भाग लिया। प्रतिभागियों ने विद्वानों और नीति निर्माताओं के साथ सार्थक चर्चा की तथा पर्यावरण एवं जलवायु संबंधी समस्याओं के प्रबंधन और समाधान में आने वाली चुनौतियों को साझा किया।
उद्घाटन सत्र में पर्यावरण विज्ञान विभाग के विभागाध्यक्ष प्रो सतीश कुमार भारद्वाज ने हिमाचल प्रदेश में जलवायु परिवर्तन से उत्पन्न प्रमुख खतरों और उनके शमन उपायों पर प्रकाश डाला। जिला आपदा प्रबंधन अधिकारी सोलन विजय सिंह ने जिला आपदा प्रबंधन प्राधिकरण की भूमिका पर विस्तार से जानकारी दी तथा प्रतिभागियों को संबंधित अधिनियमों एवं कानूनों के बारे में बताया। डॉ. प्रतिमा वैद्य ने पर्वतीय पारिस्थितिकी तंत्र के लिए जलवायु सहनशील सूखा शमन उपायों पर अपने विचार साझा किए।
हिमाचल प्रदेश विश्वविद्यालय के सिविल इंजीनियरिंग विभाग से डॉ. महेश शर्मा ने सतत पर्वतीय पारिस्थितिकी तंत्र के लिए जलवायु सहनशील अवसंरचना तथा भूस्खलन एवं ढलान विफलता के शमन के माध्यम से आपदा जोखिम न्यूनीकरण रणनीतियों पर चर्चा की। डॉ. घनश्याम अग्रवाल ने पहाड़ी क्षेत्रों में मृदा संरक्षण हेतु जल निकासी प्रणालियों के एकीकृत डिजाइन पर व्याख्यान दिया। भारतीय उच्च अध्ययन संस्थान की फेलो डॉ. आद्या दीक्षित ने आपदा जोखिम न्यूनीकरण के लिए सतत विकास के मार्गों पर प्रकाश डाला। राष्ट्रीय जल विज्ञान संस्थान के वैज्ञानिक डॉ. गोपाल कृष्ण ने पर्वतीय जलस्रोतों के जलवायु सहनशील प्रबंधन पर व्याख्यान दिया। यूएचएफ नौणी के व्यवसाय प्रबंधन विभाग के पूर्व विभागाध्यक्ष प्रो. के.के. रैना ने जलवायु सहनशील समुदायों के निर्माण में व्यवहारिक परिवर्तन के महत्व पर जोर दिया। डॉ. पूर्णिमा मेहता ने प्रतिभागियों को मौसम पूर्वानुमान और आपदा प्रबंधन में उसकी महत्वपूर्ण भूमिका के बारे में जानकारी दी। प्रशिक्षण कार्यक्रम के दौरान GRIHA (सतत भवन संहिता) की अवधारणा पर भी चर्चा की गई। समापन समारोह में वानिकी महाविद्यालय के अधिष्ठाता डॉ. सी.एल. ठाकुर मुख्य अतिथि रहे। अपने संबोधन में डॉ. ठाकुर ने प्रतिभागियों से प्रशिक्षण से प्राप्त ज्ञान और अनुभवों को अपने-अपने कार्यक्षेत्र में लागू करने का आह्वान किया, ताकि एक जलवायु सहनशील समाज का निर्माण किया जा सके।















